Saturday, December 27, 2008

उमड़-घुमड़ कर यादें आती हैं

और बरस कर आँखें थक जाती हैं

तब मेरे नीरव मानस पर

तुम अश्कों से कुछ लिख जाते हो

जीवन ज्योति धुंधली पड़ जाती है

और इक नई आकृति बन जाती है

तब मेरे उस नवीन चित्रण पर

तुम अश्रु -बिन्दु गिरा जाते हो

ह्रदय की मोंन वीणा बज उठती है

और अश्क भरी तरन्नुम बन जाती है

तब मेरे नीरस जीवन पर

तुम बदली बन कर छा जाते हो

पागल आँखें मंजिल को ढूँढा करती हैं

और मंजिल तिमिर में खो जाती है

तब मेरी इन सूनी राहों पर

तुम रोशन दीप जला जाते हो

यादें बन मयूरी उड़ जाती हैं

और तमन्ना धुँआ हो जाती हैं

तब इस बेजान जिस्म पर

तुम अपने पद्चिहन्न बना जाते हो

तुम्हारा इतना स्नेह पाकर जब मैं संभल जाती हूँ तब

तब उस शांत खडे वन पर

तुम अगनी बाण गिरा जाते हो


मानव का अस्तित्व


खो गया है कंही


तिमिर से पूर्ण आकाश में |


झूठे

Friday, December 26, 2008

यादों में कितनी कसक है

ये जानती न थी मैं

तेरी नजर में कितना असर था

पहचानती न थी मैं

गुजरे हुए लम्हों को सहेजे हूँ मैं

तेरी यादों को समेटे हूँ मैं

उस पल तू कितना करीब था

ये जानती न थी मैं

तुझे हमसफ़र जान लिया मैने

अपनी वफ़ा का सिला भी पा लिया मैने

तू मेरे दिल का रकीब था

ये जानती न थी मैं

तुझको मुबारक हों जफ़ाएं तेरी

हमने ख़ुद अपने नशेमन को जलाया है

तू फकत एक खवाब था

ये जानती न थी मैं

यादों मैं कितनी कसक थी

जानती न थी मैं

तेरी नजर मैं कितना असर था

पहचानती न थी मैं

एक जर्रा था जो आफताब बन गया

वो इंसा मेरे लिए खुदा बन गया

इबादत -ऐ -इश्क में रुसवा बहुत हुए

मेरा हमनशी मेरा रकीब बन गया

रंज है वो राज -ऐ -उल्फत न समझा

दिल है की उस बेवफा का बन गया

तू रहे शाद ये तमन्ना है मेरी

मेरा हर गम-ऐ-खवाब हकीकत बन गया