उमड़-घुमड़ कर यादें आती हैं
और बरस कर आँखें थक जाती हैं
तब मेरे नीरव मानस पर
तुम अश्कों से कुछ लिख जाते हो
जीवन ज्योति धुंधली पड़ जाती है
और इक नई आकृति बन जाती है
तब मेरे उस नवीन चित्रण पर
तुम अश्रु -बिन्दु गिरा जाते हो
ह्रदय की मोंन वीणा बज उठती है
और अश्क भरी तरन्नुम बन जाती है
तब मेरे नीरस जीवन पर
तुम बदली बन कर छा जाते हो
पागल आँखें मंजिल को ढूँढा करती हैं
और मंजिल तिमिर में खो जाती है
तब मेरी इन सूनी राहों पर
तुम रोशन दीप जला जाते हो
यादें बन मयूरी उड़ जाती हैं
और तमन्ना धुँआ हो जाती हैं
तब इस बेजान जिस्म पर
तुम अपने पद्चिहन्न बना जाते हो
तुम्हारा इतना स्नेह पाकर जब मैं संभल जाती हूँ तब
तब उस शांत खडे वन पर
तुम अगनी बाण गिरा जाते हो